
भारत माँ के भाल की,हिन्दी हिन्दी जान।
देवनागरी से निवृत,है अपना अभिमान।।
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भक्तिकाल के स्वर्ण का,यह अकूत भंडार।
तुलसी ,सूर ,कबीर सब ,इसके पहरेदार।।
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मीरा के हैं श्याम प्रभु, प्रेम सखा रसखान।
केशव,रत्नाकर कहीं ,घन आनन्द सुजान।।
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हिन्दी के यह जनक हैं ,भारतेन्दु है नाम।
जयशंकर और पन्त को,भाषा करे प्रणाम।।
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रत्नाकर ,हरिऔध का , बृज,अवधी में नाम।
दिनकर से दिनकर रहे,उनको करूंँ प्रणाम।।
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कहीं महादेवी अमर , झाँसी में चौहान।
उधर हुआ’साकेत’में,संस्कृति गौरव गान।।
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नतमस्तक हो मैं करूंँ , हिन्दी का सम्मान।
सुरसरि सम बढ़ती रहे, लिए नवल उत्थान।।
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आशा बिसारिया चंदौसी




