साहित्य

हिंदी को अब मन से स्वीकार करें

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’

कितना अच्छा हो जाये यदि
भाषा राष्ट्र की मातृभाषा हो,
सारे सरकारी काम काज भी
मातृभाषा में हों तो अच्छा हो।

भारत की भाषाई नीति ऐसी हो,
मातृभाषा सबकी प्रथम भाषा हो,
राष्ट्र की राजभाषा सर्व मान्य हो,
सर्वसम्मति से सबको स्वीकृत हो।

अंग्रेजी भाषा अब नहीं स्वीकार है,
अंग्रेजी के स्थान पर अब हिंदी हो,
भारत की राजभाषा अब हिंदी हो,
हिंदी माध्यम से संस्कृत उन्नत हो।

हमारी संस्कृति का आधार यथा
देव भाषा संस्कृत सनातन से है,
और यही संस्कृत सभी भारतीय
भाषाओं की जननी- स्वरूप है।

आदित्य सही समय अब आ गया है,
हिंदी को अब मन से स्वीकार करें,
राष्ट्र और राष्ट्र के विकास हित में,
सभी एकजुट हो हिंदी का मान रखें।

आधुनिक काल का हिन्दी साहित्य

आधुनिक काल के हिन्दी साहित्यकार
आधुनिक कवियों कथाकारों और
साहित्यकारों से संपन्न सुशोभित है,
यह काल कई चरणों में विभाजित है।

भारतेन्दु युग से प्रारंभ, द्विवेदी युग,
छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद,
नई कविता, अकविता, समकालीन
कविता हिन्दी साहित्य के चरण हैं।

प्रथम चरण में भारतेन्दु हरिश्चंद्र,
द्वितीय चरण द्विवेदी द्वय युग है,
छायावाद के प्रसाद, पंत, निराला,
महादेवी वर्मा आदि चार कवि हैं।

जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत,
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी
वर्मा, इन चारों का छायावादी युग,
हिन्दी साहित्य के उत्कर्ष का युग है।

सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक,
आंदोलन हिन्दी काव्य में नई चेतना,
तथा नये विचारों को जन्म देते हैं,
और बहुआयामों को स्पर्श करते हैं।

धर्म, दर्शन, कला एवं साहित्य आदि
दृष्टिकोणों का आविर्भाव करने वाले,
अयोध्यासिंह हरिऔध, मैथिलीशरण
गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र आदि थे।

सियारामशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल,
श्यामनारायण पांडेय, सोहनलाल
द्विवेदी, सुभद्राकुमारी चौहान और
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हैं।

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, नंददुलारे
बाजपेयी अनेकों कवि कथाकार हैं,
आदित्य ऐसे ही अनेकों साहित्यकार
कवि हिन्दी साहित्य के सृजनकार हैं।

विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ

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