
बचे रहें ये
जल, जंगल, ज़मीन,
इनके बीच बसते रहें
वे बच्चे –
जो बिछाते हैं धरती,
ओढ़ते हैं गगन,
और वृक्षों को वस्त्र की तरह पहनते हैं।
लूट की होड़ मच चुकी है,
सब कुछ हड़प लेना चाहते हैं वे –
उस पवित्र ज़मीन को भी,
जिसे लोग पूजते हैं,
जिनकी साँसों में
हवा, पानी और पहाड़ बसते हैं।
जब तक जंगल में
उसके अपने लोग रहेंगे,
तब तक कोई कंक्रीट का साम्राज्य
छीन नहीं सकता –
जल, जंगल, ज़मीन,
हवा और पहाड़।
@ आकिब जावेद
बांदा, उत्तर प्रदेश




