साहित्य

मशालें वफ़ा की

पूर्णिमा सुमन कवियत्री

​​हर कली खिल उठे, मुल्क आबाद हो,
आने वाली सहर, ग़म से आज़ाद हो।
हम तो सो जाएंगे, ओढ़ कर ये ज़मीं,
तुम जिसे सींच सको, ऐसी बुनियाद हो।
​ये वतन की अमानत, सम्भालो ज़रा,
तुम बढ़ाना वफ़ा के, कदम साथियों।
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों।

​आँख उठाई अगर, किसी गद्दार ने,
चीर देंगे उसे, अपनी तलवार से।
हमने सीखा नहीं, सर झुकाना कभी,
जंग जीतेंगे हम, अपने किरदार से।
​लिख रहे हैं लहू से, विजय की कथा,
ना झुकेगा कभी, ये गगन साथियों।
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों…

​मज़हबों के नहीं, मुल्क के नाम पर,
जी रहे हैं यहाँ, एक पैगाम पर।
जो मिटा दे हमें, वो बना ही नहीं,
जान कुर्बान है, इस ही अंजाम पर।
​एक झंडा रहे, एक ही धुन रहे,
तुम सजाना ये अपना, चमन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले, वतन साथियों।

पूर्णिमा सुमन कवियत्री
झारखंड धनबाद

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