
मैंने खुशी से पूछा—
“तू मिलती क्यों नहीं?”
खुशी मुस्कुराकर बोली—
“मैं छुपी नहीं हूँ,
तुम ढूँढते गलत जगह हो।”
मैं तो हर पल पास हूँ,
एक छोटी मुस्कान में,
किसी अपने के साथ में,
या चाय की एक शाम में।
तुम बड़े पलों के पीछे,
छोटी खुशियाँ भूल जाते हो,
दौड़ते रहते हो इतना,
कि जीना ही भूल जाते हो।
फिर कहते हो—
“खुशी नसीब नहीं होती।”
खुशी दूर नहीं होती,
बस महसूस करनी होती है।
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




