
बने मासूम वो चेहरा ढक निकलते हैं।
बेरहम वार वही हमपे किया करते हैं।।
क्यूं बने दोस्त तेरे हम,दिल के तुम काले हो।
जाने क्या क्या ज़हर मन में अपने पाले हो।।
खा रहे पेट- भर रोटी मेरे घर में तुम सब।
लगे हों आंख दिखाने हमको ही तुम अब।।
इनाम रंग का है खून बताया उसने।
रहे हैं बेच जो सड़कों पे रोज़ रंगों को।
महीना पाक है दिल भी पाक रक्खा़ करो।
खुदा की नेमत बच्चे शराऱत माफ किया करो।।
हिमाकत़ कर रहे हों देश में मेरे सुन लो
लगी गर आग सब ख़ाक़ में मिल जाएगा।।
अंजू विश्वकर्मा अवि
गोरखपुर उ.प्र.।




