
बगिया के दो फूल ये, बेल बढ़ाएंँ खूब ।
बढ़े सदा कुल बेल ये, जैसे नन्ही दूब ।।
जैसे नन्ही दूब, बाग की शोभा गढ़ती ।
वैसे ही ये फूल, इन्हीं से बगिया सजती ।।
नीलम के दो रत्न, हृदय भरते गागरिया ।
इनमें भर संस्कार, खिलेगी मेरी बगिया ।।
बगिया आंँगन की खिले, चहके चिड़ियांँ भोर ।
भाई बहन के प्रेम की, सुंदर लगती डोर ।।
सुंदर लगती डोर, बड़ा पावन है बंधन ।
इनका हो संसार, जहांँ महके सुख चंदन ।।
नीलम दे आशीष, मिले बस प्रेम नगरिया ।
शीतल बहे बयार, कृपा बरसे प्रभु बगिया ।।
बगिया में आदित्य के, सुख का रखना राज ।
जीवन इसका श्रेष्ठ हो, रानी इसका साज ।।
रानी इसका साज, बनाए रखना जोड़ी ।
मिंकी रिंकू साथ, सुनाना इनको लोड़ी ।।
नीलम का है स्वप्न, प्रेम के बहती नदिया ।
सुखी रहे परिवार, खिले दोनों की बगिया ।।
सावन बरसे प्यार का, घर आंगन में रोज ।
हर दिन हो त्योहार सा, खुशियां भरती ओज ।।
खुशियां भरती ओज, प्रेम का इत्र लगाकर ।
सुख दुख बांटें साथ, यहां सब हाथ बढ़ाकर ।।
कहती है यह रत्न, सोच रखनी है पावन ।
धर्म कर्म की राह, पुण्य का बरसे सावन ।।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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