साहित्य

ग़ज़ल

वाई. वेद प्रकाश

किससे किसको डर लगता है।
खुद को खुद से डर लगता है ।
शैतानों से क्या कहने अब,
इंसानों से डर लगता है।
पैताने कब से बैठे हैं,
सिरहानों से डर लगता है।
रोने पर जाने क्या होगा ,
मुस्कानों से डर लगता है।
झूठों के दरबार सजे हैं ,
बेईमानों से डर लगता है।
गला घोट रख दे ना मेरा,
दीवानों से डर लगता है।
भ्रष्ट हुई जब से यह दुनिया,
ईमानों से डर लगता है।

वाई. वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
9670040890

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