साहित्य

पुस्तक समीक्षा डा. अभि दा : एक बहुआयामी व्यक्तित्व (दि ग्राम टुडे ई-पत्रिका)

समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव

आज के समय में, जब व्यक्तित्व प्रायः प्रचार-प्रसारका उत्पाद बनते जा रहे हैं और उपलब्धियाँ आत्मप्रशंसा की मोहताज प्रतीत होती हैं, ऐसे दौर में डा. अभि दा का जीवन एक मौन किंतु सशक्त प्रश्न बनकर सामने आता है—क्या व्यक्तित्व गढ़े जाते हैं या तपकर निर्मित होते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर स्वयं डा. अभि दा हैं। प्रस्तुत विशेषांक उन्हें किसी एक पद, परिचय या भूमिका में सीमित नहीं करता, बल्कि उन्हें विचार, प्रक्रिया और निरंतर प्रवाहित चेतना के रूप में स्थापित करता है। डा. अभि दा का व्यक्तित्व ठहराव नहीं, सतत यात्रा का प्रतीक है।
लखनऊ—नवाबी नफ़ासत, तहज़ीब और ‘पहले आप’ की संस्कृति की भूमि में 4 अगस्त को जन्मा यह व्यक्तित्व उसी नगर की बहुस्तरीय आत्मा को अपने भीतर समेटे हुए है। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेना साधारण हो सकता है, किंतु सीमित संसाधनों में असाधारण चेतना का विकसित होना उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनके पिता स्व. डा. विष्णु प्रकाश शुक्ल, केवल एक चिकित्सक या राजपत्रित अधिकारी नहीं थे, बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा के सजग प्रहरी थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनका आजीवन जुड़ाव अभि दा के व्यक्तित्व में अनुशासन नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व-बोध के रूप में प्रकट होता है।
माता—जिन्हें समाज अक्सर केवल ‘गृहिणी’ कहकर सीमित कर देता है, वास्तव में उनकी प्रथम गुरु रहीं। रामायण, धार्मिक आख्यान और आध्यात्मिक चिंतन उनके बालमन में संस्कार बनकर उतरे। यही कारण है कि डा. अभि दा के व्यक्तित्व में ध्रुव और प्रह्लाद की भक्ति, बुद्ध की करुणा, कृष्ण की कर्मठता और राम की मर्यादा एक साथ दिखाई देती है। वहीं शिवाजी और महाराणा प्रताप की कथाएँ उनके भीतर स्वाभिमान और प्रतिरोध की चेतना को जाग्रत करती हैं। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि संतुलन है, जो आज के समय में दुर्लभ होता जा रहा है।
उनकी शिक्षा केवल संस्थानों की देन नहीं, बल्कि संघर्ष की पाठशाला की उपज है। कान्यकुब्ज कॉलेज, दुर्गा भाभी द्वारा स्थापित लखनऊ मॉन्टेसरी स्कूल और लखनऊ विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठानों से शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद आर्थिक यथार्थ ने उन्हें कम उम्र में ही श्रम का मूल्य सिखा दिया। हाईस्कूल के बाद घर-घर जाकर मेघदूत शैम्पू बेचना किसी विवशता का नहीं, बल्कि स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का स्वघोष था, जो आज की सुविधाभोगी पीढ़ी के लिए एक आईना है।
सरकारी नौकरी अधिकांश युवाओं के लिए अंतिम लक्ष्य होती है, किंतु डा. अभि दा के लिए वह केवल एक पड़ाव थी। बेहतर अनुभव, व्यापक दृष्टि और आत्मविकास की चेतना ने उन्हें बार-बार नई चुनौतियाँ स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। यह अस्थिरता नहीं, बल्कि निरंतर आगे बढ़ने की मानसिकता थी, जिसने उन्हें बहुआयामी बनाया।
आज यदि उन्हें ‘चलती-फिरती पाठशाला’ कहा जाता है, तो इसलिए नहीं कि वे बहुत कुछ जानते हैं, बल्कि इसलिए कि वे जो कहते हैं, वही जीते हैं। उनके विचार पुस्तकीय नहीं, अनुभवजन्य हैं। उनका राष्ट्रप्रेम नारे में नहीं, कर्म में है। उनकी संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि नैतिक साहस का प्रमाण है।
दि ग्राम टुडे ई-पत्रिका का यह विशेषांक पाठकों को एक स्पष्ट संदेश देता है।
व्यक्तित्व पद से नहीं, प्रयत्न से बनता है और समाज को दिशा वही लोग देते हैं, जो स्वयं प्रतिदिन सीखते रहते हैं।
वैचारिक धुंध के इस समय में डा. अभि दा जैसे व्यक्तित्व दीपस्तंभ की भाँति मार्गदर्शन करते प्रतीत होते हैं।
इस विशेषांक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसमें साहित्य-जगत के अनेक प्रतिष्ठित संपादकों, साहित्यकारों, कवियों, समीक्षकों एवं विचारकों ने डा. अभि दा के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने-अपने दृष्टिकोण से विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। जिनमें प्रस्तुत अंक के संपादक डा. शिवेश्वर दत्त पांडे के कुशल संपादन में पंडित सुरेश नीरव, श्रीमती मंजू शुक्ला, सोहनलाल शर्मा ‘प्रेम’, श्रीमती सपना शिवानी केकरे, प्रवीन भूषण, यशपाल सिंह यस, सुबोध भारद्वाज, चंद्रदेव दीक्षित ‘चंद्र’, श्याम सुंदर शर्मा, डा. अनुराधा प्रियदर्शिनी, डा. अरविंद श्रीवास्तव ‘असीम’, डा. कुसुम सिंह अविचल, श्रीमती एवं श्री सुधीन्द्र पांडे, त्रिभुवन शंकर मिश्र ‘चातक’, सूरजकांत, आर.एन. सिंह ‘रुद्र संकोची’, प्रमोद तिवारी, भूदत्त शर्मा, जगदीश कौर, डा. शिवनाथ सिंह ‘शिव’, जौली सरीन त्यागी, अशोक कृष्णम्, डा. महेंद्र तिवारी ‘अलंकार’, श्रीमती रजनी शुक्ला, शिवम झा, कबीर कांति श्रीवास्तव, पंकज कुमार खरे ‘लेश’, सोनिका गोस्वामी शर्मा (एडवोकेट), डा. प्रतिभा सिंह, शशि श्रोत्रिय, श्री श्री मिश्र, रश्मि सक्सैना, डा. रामकरण साहू ‘सजल’, ललित कुमार सक्सैना, सुभाष रावत, सतीश गुप्ता पोरवाल, सुधा बसोर ‘सौम्या’, उमानाथ त्रिपाठी, अंजना सिन्हा ‘सखी’, देवव्रत शर्मा, अयन, अमृता बिसारिया, सुधीर श्रीवास्तव, जयप्रकाश शर्मा तथा रीता सिंह ने अपने आलेखों के माध्यम से डा. अभि दा के जीवन, चिंतन, सामाजिक सरोकारों और साहित्यिक अवदान को बहुआयामी रूप में रेखांकित किया है।
यह अंक केवल व्यक्तित्व-चित्रण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विभिन्न लेखों के माध्यम से डा. अभि दा को एक संवेदनशील विचारक, कर्मशील राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्व और सतत साधक के रूप में प्रस्तुत करता है। लेखकों की वैचारिक विविधता इस विशेषांक को और अधिक समृद्ध बनाती है, जिससे पाठक को डा. अभि दा के व्यक्तित्व का एक समग्र, संतुलित और विश्वसनीय चित्र प्राप्त होता है।
एक ओर जहाँ यह विशेषांक डा. अभि दा के व्यक्तित्व की आंतरिक यात्रा को उद्घाटित करता है, वहीं दूसरी ओर उनके सामाजिक, साहित्यिक और वैचारिक योगदान को भी गहराई से समझने का अवसर प्रदान करता है। इस दृष्टि से यह अंक केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि समकालीन साहित्य में व्यक्तित्व-समीक्षा का एक सशक्त दस्तावेज़ बनकर सामने आता है।

गोण्डा उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!