साहित्य

सफर से वापसी (लघुकथा)

मंजुला शरण

ट्रेन स्टेशन छोड़ने वाली थी , तभी एक बीस-बाईस की लड़की चौकन्नी नजर से कुछ ढ़ूँढ़ते हुए आ कर ट्रेन के गेट पर खड़ी हो गयी। ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। लड़की ने बेचैनी से इधर-उधर सिर घुमा कर देखा फिर अपने फोन से सीट नंबर मिला कर आपनी सीट पर आकर बैठ गयी ।
सामने वाली सीट पर एक बीमार बुजुर्ग लेटे थे , उनके पैर के पास एक बुजुर्ग महिला थकी उनींदी बैठी थीं , शायद उनकी पत्नी थीं।
बुजुर्ग के बगल में फर्श पर रखे एक छोटे से बैग पर बैठी एक बाईस साल की लड़की, उनका सिर सहला रही थी, शायद उनकी बेटी थी।
दोनों लड़कियों की आपस में नजर मिली, शिष्टाचार की एक मुस्कान के बाद करीब आधे घंटे तक अकेली लड़की अपने फोन से बार-बार किसी को कॉल लगाती और कॉल किसी के नहीं उठाने से निराश होकर रख देती।

सामने की बर्थ पर लेटे बीमार बुजुर्ग सो गए थे। उनकी बेटी ने सामने बैठी लड़की को परेशान देखा कर पूछा, तुम कुछ परेशान लग रही हो, क्या मैं तुम्हारी कोई मदद कर सकती हूँ?
मेरा नाम इरा है, ये मेरे पापा हैं।
पापा के ट्रीटमेंट के लिए हम मुंबई जा रहे हैं। तुम कहाँ जा रही हो?
उसी वक्त अकेली लड़की के फोन पर रिंग बजने लगी ।उसने झट से उठा कर देखा , फिर शिकायत करते हुए कहा – मैं कब से तुम्हारा और तुम्हारे फोन का इंतज़ार कर रही थी, कहाँ हो तुम? दूसरी तरफ से कुछ कहा गया होगा, जिसके जवाब में लड़की ने कहा-अगले स्टेशन पर? दूसरी तरफ से कुछ पूछा गया होगा, जवाब में लड़की ने कहा–नहीं कुछ भी नहीं, मेरे पास सिर्फ मेरा हैण्ड बैग है। शायद दूसरी तरफ से फोन डिस्कनेक्ट हो गया । लड़की हैलो-हैलो बोलती रही पर कोई जवाब नहीं था। सामने बैठी इरा ने कहा–परेशान मत हो ट्रेन में नेटवर्क का इश्यू हो सकता है। लेकिन क्या तुम्हारा सामान कहीं छूट गया है? तो तुम कंम्पेन करो, हो सकता है मिल जाए ।
अकेली लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। बार-बार फोन लगाती और स्विच ऑफ सुन कर परेशान होती रही। अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी। पर यहाँ उससे मिलने कोई नहीं आया, न ही फोन से संपर्क हो सका। ट्रेन बढ़ने लगी और वो लड़की इरा के सामने रोने लगी ।
इरा ने पूछा–बताओ भी क्या हुआ है? अकेली लड़की ने कहा- मेरा नाम मीठी है, अपने ब्रॉडबैंड के साथ मुंबई भागने का प्लान था। मैं घर से कैश और जेवर लाने वाली थी, पर मौका नहीं मिला,और खाली हाथ चली आई। शायद मेरे साथ धोखा हुआ है, प्यार नहीं।
इरा ने कहा– मीठी तुम धोखे से बच गयी हो। अगले स्टेशन से तुम घर वापसी का टिकट लो और घर लौट जाओ। मीठी ने कहा, घर जा कर क्या कहूँगी? इतनी देर कहाँ थी?
इरा ने कहा- आज तुम सुरक्षित हो इसे अपने माता-पिता का आशीर्वाद समझो, सच बता सको तो उन्हें बताना। वरना कह देना अपनी किसी दोस्त की मुसीबत में उसके पास रुकी थी। मीठी ने भावुक हो कर कहा , ऐसा ही करती हूँ। आज के गलत सफर से वापस होने की तुम्हारी बात मैं जिन्दगी भर याद रखूँगी। थैंक्स इरा….!

मंजुला शरण
राँची झारखण्ड़।

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