नन्हीं चिड़िया
बंद कर दिए दरवाजे घरों के।
जालियां लगा दी खिड़कियों को।
हम वहां जा कर रह ना सके,
उजाड़ दिया हमारे घोंसलों को।
पेड़ पौधों को काट डाला,
घोंसला हम बना ना सके।
हर मुमकिन कोशिश की हम,
आस पास तुम्हारे रह ना सके।
रोक तो हर तरफ से लगाई,
हमारे हौसलों को तोड़ ना सके।
कभी यहां तो कभी वहां हम,
उड़ते रहे अपने नन्हें परों से।
अपने दाना पानी के लिए हम,
किसी के मोहताज नहीं है।
कितना भी मौसम विपरीत हो,
छुप के घोंसले में रहते नहीं है।
सुबह सवेरे निकल पड़ते है
दाना पानी की खोज में।
समय बर्बाद नहीं करते है,
आपस के नोक झोंक में।
मेहनत से हम जी ना चुराते
ऊंची उड़ान भर कर आते है।
चोंच में अपने दाना ला कर,
प्यार से बच्चों को खिलाते है।
तुम इंसानों को सताती होगी
सर्दी,गर्मी और बरसात का भय।
हम तो खुले आसमां में उड़ते है
हर मौसम में हो कर निर्भय।
©️✍️®️
बंदना मिश्रा
देवरिया उत्तर प्रदेश




