
ताँक- झाँक
खुद को सँवारने की फुरसत कहाँ किसी को,
दूसरों को सुधारने का हुनर मिला है यहाँ सबको।
अपने भीतर झाँकना है सबसे कठिन काम,
पर नसीहत व उपदेश बाँटना है सबसे आसान।
अपने दोषों पर परदा, दूसरों पर रोशनी डालना
अपनी करनी पर चुप्पी साध, औरों की दोषी बताना।
बेशक खुद की राहें हों धुँधली और दिशाएँ गुमनाम,
पर औरों को रास्ता बताने में सब होशियार यहाँ।
खुद की गिरहें उलझी हैं, उन्हें नहीं रहे सुलझा,
पर दूसरों की गांठें खोलना, है स्वभाव सभी का।
अपने निर्णय लेते घबराते,मन रहता है अस्थिर,
पर सलाहों की थैली बाँटें, अपनी मुश्किलों से बेफिक्र।
खुद की भूलें हैं बेमानी और दूसरों की अपराध,
यह दोहरे मापदंडों का कैसा है अद्भुत संवाद।
आज जो स्वयं को जान ले, वही समझदार कहलाएगा
बाक़ी तो भीड़ में खड़े,बस उपदेश ही दोहराएगा।
सुमन बिष्ट, नोयडा



