साहित्य

गीत

डॉ गीता पाण्डेय "अपराजिता"

सजा हुआ है मांँ का मंदिर, द्वार सजी रंगोली।
माँ के द्वारे जो भी आए,भर देती मांँ झोली।।

लाल चुनरिया ओढ़े मैया, करके सिंह सवारी।
भक्तों को दर्शन देती हैं, छवि लगती अति प्यारी।।
भले रूप नव धारण करती, पर सब हैं हमजोली।
माँ के द्वारे—–

आभा मंडित मुखड़ा माँ का, अस्त्र-शस्त्र कर धारे।
दिग-दिगंत में शोर मचा है,गूंँज रहे जयकारे।।
भक्त मंडली कीर्तन गाती, बना बनाकर टोली।
माँ के द्वारे —–

शक्ति स्वरूपा वरदायिनि हैं,विपदा बाधा हारी।
दुष्टों की संघारक अम्बे, बनी सदा उपकारी।।
मनहर लगती माँ को हरपल,मधुरिम पावन बोली।
माँ के द्वारे——-

धूप दीप नैवेद्य आरती,चढ़े चढ़ावा भारी।
सारा जग प्रमुदित होता है, चरणों में बलिहारी।।
जो भी सच्ची भक्ति करें है, सजे भाल पर रोली।
माँ के द्वारे——

दानवता जग में है फैली, इसको मातु मिटाओ।
बहसी क्रूर दरिंदों को,दर से सदा भगाओ।।
अहंकार के मद में मानव, खेले रक्तिम होली।
मांँ के द्वारे—–

सारे जग का दुख मैया जी, पल भर में है भागे।
नवरात्रों में ज्योति जलाकर, भाग्य सभी के जागे।।
दया भाव करुणा बरसाती, मैया मेरी भोली।
माँ के द्वारे ——–

ध्वजा नारियल तुम्हें चढ़ाऊँ, तुम ही पालन हारी।
भव से पार करो तुम नइया, यह ही विनय हमारी।।
शरण तुम्हारी आकर मैया, सभी कलुषता धोली।
माँ के द्वारे ——–

डॉ गीता पाण्डेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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