साहित्य

दहेज़ भगाओ बेटियां बचाओ

संगीता वर्मा

बेटियाहै। घर की शान है,बेटियां ही अभिमान है ,देश के दहेज़ के लोभियों
से बेटियों को बचाना है,दहेज़ को दूर भगाना है, बेटियों को बचाना है ।

बेटियों को क्यू हर बार पराया कर दिया जाता है,वो अति तो वैसे ही हैं जैसे बेटा आता है,वो प्यार तो बेटो से भी
ज्यादा काटती है,फिर क्यू वो पराया कहलाती है।

वो गर मुस्कुराएगी तो घर में रोनक आएगी ,वो खुश रहेगी तो घर में लक्ष्मी आएगी,फिर क्यू बेटो से तुलना करके उनकी मुस्कुराहट छीन लेते हो,बेटी होना गलत है ये अहसास क्यू दिलाते हो ।

बेटो को आजाद छोड़ कर क्यू बेटियों को बांधते हो,शादी, बच्चे , परिवार के
नाम पर उनसे त्याग मांगते हो,दहेज़ के भूखे भेडियों को क्यूं सौप देते है,
सम्मान देने की बात आती है तो मुंह मोड़ लेते हो।

क्यू हर बार हर तरीके का गलत बेटियो के साथ होता है,क्यू हर बेटी के लिए बेटी होना बोझ होता है।जिंदगी जिंदगी का वह बहुमूल्य अंश है,जिसके बिना सब लगता है निर्वंश है।

सौभाग्य लेकर आती है बेटी दुर्भाग्य को दूर भागाती है बेटी लक्ष्मी का रूप है
बेटी दुर्गा का स्वरूप है बेटियों से ही रोशन है यह जग सारा।

छोटे-छोटे कदमों से सुंदर सी मुस्कान से
सबके दिलों को भा लेती है।बेटी गर्व है तो बेटी में बस्ता स्वर्ग है बेटियां घर की रौनक है जब यह घर में आती है तो फिर घर फूलों सा महकता है।

यह बेटियों का जीवन भी कितना अजीब होता है ना जन्म कहीं और होता है जाना किसी और घर पड़ता है
जिस घर में बचपन जीती है उसी घर को छोड़कर जाना पड़ता है।

बेटियां पापा की आंख का तारा होती है
मां की राजदुलारी होती है भाई की शान
और घर का मान होती है यह इतनी प्यारी होती है एक पिता के लिए बहुत कठिन होता है अपनी बेटी को विदा करना बेटियां एक अनमोल सितारा होती है।

संगीता वर्मा
कानपुर उत्तर प्रदेश

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