साहित्य

माशूक की अभिलाषा

संजय मृदुल

सुनो! एक सिलेंडर भरवा लाओ न
बुझी पड़ी है जो आग बरसों से
फ़िर से जला लाओ न।
यूँ तो एक दीवार का है फासला
सिलेंडर के बहाने मिटा जाओ न
अबोला ख़त्म हो जाए इसी बहाने
कोई जुगत लगा आओ न।
छुप छुप कर देखते हो मुझको
बात करने की कोशिश करते हो
डर जाते हो जाने किस बात से
सामने आने से भी घबराते हो
यह मौका है सुनहरा सुनो तो
एजेंसी से पर्ची कटवा आओ न।
पापा भी ख़ुश हो जाएँगे
तुम्हारे नम्बर बढ़ जाएँगे
इसी बहाने लाँघ लोगे दहलीज
जोया के कुन्दन कहलाओगे
एक प्याली चाय पी जाओ न।
फक्त एक सिलेंडर की बात नहीं
इश्क़ के बढ़ने का सफ़र है
गैस एजेंसी वाले दोस्त को
एक बार और कॉल लगाओ न
मुँह अँधेरे गोदाम में लाइन लगाओ न
बस इतना करो न सनम मेरे लिए
एक सिलेंडर भरवा लाओ न।
पूजा करूँगी सुबह शाम तुम्हारी
बैठ जाऊँगी देहरी पर तुम्हारी
मानूंगी मम्मी पापा को अपना तुम्हारे
बहन से भी प्यार जताऊंगी
ख़ुद लेकर आऊँगी बारात मैं
बस एक सिलेंडर भरवा लाओ न।
उम्मीद से देखते हैं पापा तुम्हारी ओर
मम्मी इंडक्शन से परेशान है
न टाइम पे मिलती चाय है न लंच डिनर
युद्ध के दौर में चल रहा उपवास है
एक तुम हो उम्मीद की किरण हमारी
सिलेंडर लाकर उजियारा फैलाओ न
सालों से जो तुम कर रहे कोशिश
इस गैस के बहाने हाथ माँग जाओ न।
©संजय मृदुल
रायपुर

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