साहित्य
खामोश रहो कुछ न कहो

खामोश रहो कुछ न कहो,
लबों पे बस मुस्कान रखो।
अल्फ़ाज़ कभी बोझ बनें तो,
ख़ामोशी को पहचान रखो।
हवा भी चुपचाप चलती है,
फिर भी पैग़ाम सुना जाती है।
आँखों की नमी बिना बोले,
दिल की बात कह जाती है।
शोर बहुत है इस दुनिया में,
सच अक्सर दब जाता है।
खामोशी की एक सदा में,
हर झूठ पिघल जाता है।
टूटे ख़्वाबों को शब्द न दो,
उन्हें नींद में पलने दो।
खामोश रहो कुछ न कहो,
ख़ुद को थोड़ा सँभलने दो।
जो समझेगा वो समझ ही ले,
इशारों की भी ज़ुबान होती।
हर बात कहनी ज़रूरी नहीं,
चुप्पी भी एक बयान होती है!
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




