साहित्य

प्रदूषण विधा-सरसी छंद

डॉ गीता पांडेय

शीर्षक -प्रदूषण
विधा-सरसी छंद

आज प्रदूषण बनी समस्या, गाँव नगर चहुंँ ओर।
कुछ विकास के पथ पर चलते,कुछ करते हैं शोर।।

काट रहे पेड़ों को हर दिन, करने को उत्थान।
जगह-जगह खालीपन दिखता,जंगल हुए विरान।।

भाने लगा सभी को अब तो, कलयुग का यह छोर।
जीवन में कैसे अब आए, सुखमय सुंदर भोर।।

हरियाली से नाता देखो, तोड़ रहे सब आज।
त्राहिमाम मानव अब करता, गिरी ताप की गाज।।

नहीं अछूता कोई कोना, धरती के हर कोर।
सबके मन को झांँका मैंने, दर्द दिखा हर पोर।।

हवा नीर ध्वनि मृदा प्रदूषित, दूषित आज प्रकाश।
नहीं लगाएँगे यदि तरु हम , होगा शीघ्र विनाश।।

जाल बिछा सड़कों का कैसा,धरती रही कराह।
प्राण वायु बिन मरते प्राणी, पूर्ण नहीं हो चाह।।

प्रज्ञा सबकी हरण हुई हैं, चले न कोई जोर।
नहीं सोचते आगामी को, छाया संकट घोर।।

चलता रहा अगर ऐसे ही,दिवस नही वह दूर।
सांँसें लेना दूभर होगा, आए याद कसूर।।

अभी समय है चेत जरा लो, गाँव गली हर ओर।
वृक्ष लगाओ खूब धरा पर, हो सुवास की भोर।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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