
पंचमी रात्रि शैलपुत्री महागौरी माता।
स्कन्द कार्तिकेय,जननी कहलाती हैं।।
पकड़ उंगली भगवान कार्तिकेय को।
तीर कमान से युद्ध कला सिखाती है।
सतयुग तारकासुर के अत्याचारों से।
सुर संत जन देव् हुए थे सब परेशान।।
शिवपुत्र स्कन्द कुमार से संहार होने।
मिला तारकासुर दैत्यको था वरदान।।
शिवपुत्र से होने मृत्यु, वर प्राप्त कर।
तारकासुर भीषण उत्पात मचाया था।।
असुर वध करने माँ स्कन्दकुमार को।
अश्त्र- शास्त्रों की कला सिखाया था।।
चतुर्भुजी हैं कमलासनी स्कन्द माता।
पीतवस्त्र भोग कदली फल सुहाती है।।
शस्त्र शास्त्र सब ज्ञान के प्रदायिनी माँ।
दीनहीन भक्तों के नैय्या पार लगाती है।।
पंच नवरात्रि,माँ को धूप कपूर आरती।
लगाके भोग नैवेद्य सेवा जो जन गावै।।
धन वैभव यश सुख संतान का पाकर।
सुर संत जन निज जीवन धन्य बनावै।।
माँ की कृपा ऐसी स्कन्द धाम को पावै।।
मौलिक स्वरचित रचना
बसंत श्रीवास वसंत (नरगोड़ा)
रामकृष्ण मिशन आश्रम नारायणपुर
छत्तीसगढ़




