
उन्नति बहुत किया भारत नें, मिटा न पाया भ्रष्टाचार।
नहीं उठाया ठोस कदम है,चाहे जो भी हो सरकार।।
ज्वार विचारों का बदलें हम, झंकृत हो मन का संगीत।
अभिलाषा उर की ऐसी हो, सभी दिलों को जो ले जीत।।
मानवता को जीवित रखना, बने हमारा पहला धर्म।
रहे वतन में सुख शांति सदा, हों परमार्थ हितैषी कर्म।।
सुख-दुख में सहभागी बनकर,दूर करें सब विगत विकार।
ललित कला से रूप सजाकर,नदियों सा दें पावन धार।।
क्षण भंगुर यह देह हमारी, इस पर करें नहीं अभिमान।
साधन ऐसे अपनाएँ हम, जिससे मिले जगत पहचान।।
धूल उदासी की झाड़ें हम, करें बेटियों का सम्मान।
खुशियाँ झोली में भर इनकी, लाएँ अधरों पर मुस्कान।।
दुष्ट अधर्मी बढ़े हुए हैं, इनका करना है संघार।
भगनी दुहिता लाज बचाएंँ, करें प्रतिज्ञा अंगीकार।।
संकल्पित हो भारत वासी, चलो रचे फिर से इतिहास।
दूर हुई जो खुशियांँ हमसे उनको लाएँ उर के पास।।
ध्यान योग साधन अपना कर, करें प्रेम का जग विस्तार।
स्वच्छ भावना मन में रख लें,जीवन का यह असली सार।।
सफल वही मानव जीवन है,जो रखता हो सेवा भाव।
करुणा दया हृदय में उपजे, ममता-समता बहे बहाव।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




