
द्वारिकाधीश की नगरी,
बड़ी मन मोहक,
गिरधारी के मस्तिष्क पर ,
मोर मुकुट सजे,
देखने में जो अत्यधिक सुंदर लगे ।
वस्त्र पहने पीत रंग के,
हाथ में मुरली धरे।
माँ के राज दुलारे ,
अशोधा सिर्फ कान्हा-कान्हा पुकारे।
ओर जब कान्हा की शिकायत आवे ,
टोह खूब दांत भी लगावे ।
मक्खन की मटकी फोड़े ,
गोवर्धन वो उठा लेवे।
अलग सी थी बात है,
गिरधारी सबके साथ है।
बस समझने की ये बात है,
हरदम द्वारिकाधीश अपने साथ है।।
– रिया राणावत
कालीदेवी, झाबुआ (मध्यप्रदेश)




