साहित्य

लिखूँ मैं मन को पाती

पूर्णिमा सुमन

लिखूँ मैं मन को पाती,

एक मुक्तक मन को।

जो भूल के सब बंधन,

महकाए इस जीवन को।

 

सुलझाऊँ उलझन सारी,

जो भीतर ही सुलगती,

पहचानूँ उस खुशबू को,

जो सांसों में मचलती।

खोया जो था बचपन का,

लौटाऊँ उस सावन को,

लिखूँ मैं मन को पाती,

एक मुक्तक मन को।

 

तू क्यों दुनिया की सुनता,

क्यों खुद से ही डरता है?

क्यों झूठी इस बाज़ी में,

हर रोज़ बिखरता है?

अब छोड़ दे सब चिंता,

अपना ले तू इस क्षण को,

लिखूँ मैं मन को पाती,

एक मुक्तक मन को।

 

न समझ सकी यह दुनिया,

मेरे पावन अंतर्मन को,

आरोपों के तीरों से,

किया घायल तन को।

छौड़ प्रपंचों की नगरी,

अब दूर कहीं बह जाना है,

जहाँ सुध-बुध खोकर ,

दोनों को बस खो जाना है।

न कोई शिकवा, न कोई गिला,

अब सौंपू इस जीवन को,

लिखूँ मैं मन को पाती,

एक मुक्तक मन को।

 

चलो आज चलें उस पार,

जहाँ पंख हवा के हों,

कोई शिकवा-गिला न हो,

बस गीत वफ़ा के हों।

मैं सौंप कर सब चाहतें,

छूना चाहूँ नील गगन को,

लिखूँ मैं मन को पाती,

एक मुक्त क मन को।

 

पूर्णिमा सुमन

झारखंड धनबाद

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