
अपने ही बनाए पिंजरों में,
कैद हो गया है समाज।
नए विचारों को अपनाता नहीं,
पुराने विचारों का पहना ताज।
पुरानी रीति की जंजीरों में जकड़ा,
मुक्त होना ही नहीं चाहता है।
नई आशाएं आवाज है दे रही,
सफलता को छूना नहीं चाहता है।
जाति धर्म ऊंच नीच की दीवारें,
नफरत को बढ़ाती जा रही है।
पूर्वाग्रह के निम्न विचारों में,
इंसानियत खोती जा रही है।
विचारों के कैदी समाज को,
नवीन विचारधारा में ले आए हम,
पुरानी रूढ़ियों से खुद को मुक्त कर,
मानवता को सही राह दिखाएं हम।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




