
हसरतें है मेरी भी कुछ मैं भी एक जान हूं
जिम्मेदारी के बोझ तले दबा हुआ मैं भी एक इंसान हूं
भूल गया हूं अपनी ख्वाहिशें बाकी सबकी याद रखता हूं
करूं भी तो क्या करूं मैं ही घर का मान हूं
दर्द अपना किसी को बता नहीं सकते
क्योंकि मर्द है हम किसी के आगे रो नहीं सकते
बचपन से सिखाया है हमें तुम्हें घर चलना है
ज़ख्म दिल के बयां भी कर नहीं सकते
ख्वाब देखे थे कभी आसमां में उड़ने के
अपने बलबूते चाहतों को पूरा करने के
सिमट कर रह गई है जिंदगी बस अपनी
आमदनी अठन्नी रूपया खर्चा गिनने में
जिंदगी की भाग दौड़ में कहां चला आया हूं
सपनों के निशां पीछे छोड़ चला आया हूं
वक्त नहीं इतना मुड़ कर देखूं जरा
दिल के अरमान कहीं मिट्टी पर लिख छोड़ चला आया हूं
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍️ स्वरचित रचना
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




