साहित्य

धरती का चीरहरण

उर्वशी चौधरी

हम दु:शासन बन
धरती का करते चीरहरण
वृक्षों को काट उसे
करते नग्न निरंतर

हैरान है वह आज
अपनो की बेहयाई पर

व्यर्थ बहाया इतना जल हमने
सूख गए सब पोखर ताल
देख धरा की दुर्दशा
मौसम का भी बिगड़ा मिज़ाज

उजाड़ दी सुख समृद्धि की खानें
हमने तो सौदाई बन

कभी स्वर्ग हुआ करती थी
दुल्हन सी सजी रहा करती थी
अलंकृत हो हरीतिमा के अलंकार से
यौवन रस से भरी रहा करती थी

नाज़ हमें भी था
उसकी इस तरुणाई पर

जिस धरती की गोद में
हम खेले पले बढ़े हैं
उसका ही अस्तित्व मिटाने
हम क्यों आज चले हैं

कुछ तो तरस खाओ
खुदा की इस खुदाई पर

फूलों को खिलने दो
हरियाली पलने दो
पक्षियों के गीतों से
भोर सुहानी सजने दो

कब तक यूँ चुप बैठोगे
तुम तमाशाई बन?

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