साहित्य

ग़ज़ल

संगीता श्रीवास्तव

होना क्या अंजाम हमेशा तय रहता है।
किसका कितना काम हमेशा तया रहता है।

आप किसी पर तोहमत कैसे रख सकते हैं,
शय मिलनी या मात हमेशा तय रहता है।

मात पिता के चरणों में हीं तो होते,
चारो तीर्थ धाम हमेशा तय रहता है।

जिस शरीर पर करते नाज़ घमंड सुनो,
होना खाक तमाम हमेशा तय रहता है।

आप तो पानी समझ के उसको पी जाओ,
जहर मिले या जाम हमेशा तय रहता है।

खुरच रहे नाखून से क्यो दीवार वक्त की‌
क्या होगा उस पार हमेशा तय रहता है।

कौन पढेगा भाषा मौन तुम्हारे मन की,
कौन बनेगा खास हमेशा तय रहता है।
संगीता श्रीवास्तव

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