
जहाँ किसी से न बैर कोई,
सभी हों अपने न गैर कोई,
सभी खुशी में हों सबकी शामिल
तलाश मुझको है उस जहाँ की।
जहाँ किसी में न हो बड़प्पन,
नहीं बड़ा-छोटा कोई, सब सम,
जहाँ नहीं ऊँच-नींच कोई,
तलाश मुझको है उस जहाँ की।
जहाँ पराया हो दर्द अपना,
एक ऐसी दुनिया का देखूँ सपना
लगे पराई भी पीर दिल को,
तलाश मुझको है उस जहाँ की।
जहाँ न ईर्ष्या हो, डाह ना हो,
किसी की उन्नति में, आह ना हो,
सभी की उन्नति में सब ही नाचें,
तलाश मुझको है उस जहाँ की।
बता दो ऐसा जगत सुहाना,
मिलेगा ऐसा कभी जमाना?
चलो जी मिलकर बनाएं हम सब,
तलाश मुझको है जिस जहाँ की।
– नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।




