साहित्य

ग़ज़ल

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण

कोई शिकवा भी नहीं कोई शिकायत भी नहीं
अय मेरे दोस्त कोई तुझसे बगावत भी नहीं

अपनी पहचान छुपाये मैं फिरा करती हूं
तेरी दहलीज़ पे आने की इजाज़त भी नहीं

रंज ग़म ओढ़ के हर शब ही मैं सो जाती हूं
गैर तो गैर थे अपनों में शराफत भी नहीं

गर मैं मुजरिम हूं मेरे कान्हा सज़ा दे मुझको
कोई तुझसे बड़ी दुनिया में अदालत भी नहीं

इस लिए कोई भरोसा उषा करता ही नहीं
आज तक आपकी बातों में सदाकत भी नहीं

डॉ उषा अग्रवाल जलकिरण
छतरपुर मध्यप्रदेश

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