साहित्य

लिए उस्तरा बंदर बैठा

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

लिए उस्तरा बंदर बैठा,हम सब की मजबूरी है।
सिर मुंडवाते ओले पड़ना, ख्वाहिश अभी अधूरी है।

सत्ता के लिजलिज गद्दे पर,साहब जी हमबिस्तर हैं।
आग लगे तो जल जाने दो,अलिखित सब मंजूरी है।

इश्क न देखे जाति कुजाती,नींद न टूटी खटिया को।
फिर ये इतने घेरे क्यों हैं,धोखा बहुत जरूरी है।

दर्पण को झूठा कहने की,आदत यार बदल डालो।
झुर्री,झांईं,रंग न बदले, कोशिश चाहे पूरी है।

कब तक बंदरिया नाचेगी, बाजीगर की डंडी से।
झूठा वादा अब न छलेगा-श्रद्धा और सबूरी है?

सौदे पर सौदे,न्यायालय भी,भगवान बिकाऊ है।
कोई झूठा वहम न पालो,बस नोटों की दूरी है।

हर उजास के पीछे बैठी,काली छाया रहती है।
चुप हो कर के मुजरा देखो, यही असलियत पूरी है।

सरकारी पन्नों पर रहमत,दस्कत मोहर पूरी है।
फाइल में किस्मत उलझी है, फर्जी सब्जी पूरी है।

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव
रामपुर मथुरा जिला सीतापुर

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