
चेहरे पर हँसी सजाकर, जग को सरल दिखाता हूँ,
भीतर कितने शूल छिपे, किसको यह बतलाता हूँ।
हर महफ़िल में आगे रहता, हँसता और हँसाता हूँ,
अपने सूने एकांतों में, चुपके-चुपके ढह जाता हूँ॥
हँसी बाँटने का व्रत लेकर, हर पीड़ा सह जाता हूँ,
अपनों के खातिर हर आँसू, दिल में ही रह जाता हूँ।
कोई पढ़ न ले यह पीड़ा, इस भय से मुस्काता हूँ,
सच कह दूँ तो नयनों से, सागर बन बह जाता हूँ॥
रिश्तों की खातिर खुद को, हर पल आजमाया है,
अपने हिस्से के सपनों को, चुपचाप भुलाया है।
जिनके चेहरे पर हँसी रहे, बस इतना अरमान रहा,
अपने सुख सब त्याग दिए, उनका जग सजाया है॥
मत पूछो इस हँसी के पीछे, कितनी रातें रोया हूँ,
कितनी आशाएँ टूटीं, कितने सपनों को खोया हूँ।
फिर भी “दिव्य” ये जीवन मेरा, हार नहीं मानता है,
टूटकर भी हर बार नया, संकल्प यही संजोया है॥
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल, उत्तर प्रदेश




