हर्षित थे प्रकृति सब सहचर ,
मानव सा युवराज मिला था।
रक्षित रहेगी सृष्टि धरोहर ,
भूते रत हित भूप सजा था। ।
मुक्त हास बिखेरते पर्वत ,
जल धाराएं थीं प्रसन्नमना।
नभचर-वनचर डोलें सर्वत ,
तरू लताएं भी हरितिमा। ।
सखा भाव था सबसे ऊपर ,
सामंजस्य की धार बही ।
चले परस्पर पूरक बन कर ,
सदियों तक यही प्रथा रही।।
तभी यकायक कलियुग आया,
मानुष-मन में भ्रम भरमाया ।
स्वार्थ-कीट ने घात लगाया ,
रक्षक से भक्षकपन भाया ।।
क्रूर भाव से खंडित पर्वत,
कलकल सदा वाहिनी अपहृत।
भू संचित जल दोहन अनवरत ,
वनांचल अब निकटप्राय मृत।।
होने लगे विखंडित अवयव,
टूटा जड़-चेतन लय-बंधन ।
भंग हुआ स्वाभाविक कलरव
सूत्र नियंत्रक करते क्रंदन।।
असहनीय पारिस्थितिकि जन्या
रुष्ट प्रकृति रौद्र रूपिणी।
अंकधारिणी जननी सौम्या,
बन बैठी प्रतिशोध हारिणी ।।
श्रीमती विनोद शर्मा
रानीबाग, धामपुर
जिला-बिजनौर




