साहित्य

नारी

जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी "जीत"

ममता की मूरत नारी, धीरज धरा समान।
आँचल में आकाश सा, चरणों में विश्राम॥

पीड़ा सहकर हँस पड़े, ऐसा उसका मान।
टूटे सपनों से रचे, जीवन का सम्मान॥

सूरज जैसी तेज है, चंदा जैसी शीत।
अंतर ज्वाला साथ में, मुख पर मधुर प्रीत॥

अपने सुख को त्यागकर, रखती सबका ध्यान।
नारी तेरे रूप में, बसता हिन्दुस्तान॥

अन्यायों की धूप में, बनती वह तूफान।
दुर्गा बन संहार कर, रखती जग की शान॥

नारी केवल देह नहीं, शक्ति सृजन विस्तार।
उससे ही संसार है, उससे ही संसार॥

~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”छत्तीसगढ़

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