साहित्य

रूठना

राजीव त्रिपाठी

अब के रूठो तो पहले
मार देना मुझको
अहम इन्सान के आसानी से,
कहांँ मरते है!!
तुम्हें क्यों ज़िद है हमें
बदलने की,
खोटे सिक्के आसानी से
कहांँ चलते हैं!!
तुम्हारी महफ़िलों में लोग
संभलते होंगे,
नादान है गिरने वाले
लोग जो नज़रों से गिरते है!!
छेड़ते है हमें लोग तेरा
नाम लेकर,
हर बार तुम्हारा ही ज़िक्र
करते हैं!!
लोग वजह पूछते हैं यूंँ तन्हा
रहने की,
जैसे घर के वह दामाद
हो रखे हैं!!
दूरियांँ बढ़ने का तुम्हें फ़र्क़
पड़ता नहीं,
क्यों इतनी तंग गलियों से
आप गुज़रते हैं!!
हाल कैसा भी हो मुस्कुरा
कर दो जवाब,
बहुत सोच कर आप
बग़ावत करते हैं..!!

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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