
ज़िन्दगी जब समझ में आती है
तब तक उम्र गुज़र जाती है!!
दिल से खेलना कोई उनसे सीखे
हमारी तो जान निकल जाती है!!
ज़िन्दगी खोने का नाम लगता है
या फिर रिश्तो में बँट जाती है!!
स्थाई कोई रिश्ते नहीं रहते
समझने में उम्र गुज़र जाती है!!
उसने थामा है मेरा हाथ जब से
अब ज़माने की कहांँ फ़िक्र आती है!!
सारे जहांँ से हम बेर क्यों लें
हक़ीक़त ख़ुद सामने आ जाती है!!
वह दग़ा करके भी पछताते नहीं
हम बेगुनाह पर ही बात आती है!!
इबादत में हम करते हैं सज्दा
ख़ुदा तक दुआ पहुंँच ही जाती है!!
आईना आजकल नहीं देखते
ग़लतियाँ ग़ैरों में ही नज़र आती है!!
अब तो इंतिज़ार भी थक चुका है
राहों में पलके बिछ ही जाती है..!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




