
कुरु क्षेत्र में देख स्वजन,
आकुल पार्थ अपार।।
गात कंपहि अश्रु स्रवत,
करता आर्त पुकार।।
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केशव कैसे करूँ मैं,
निज प्रिय जन का घात।।
भागी बनूँ अधर्म का,
कहन लगा बिलखात।।
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पाला पोसा सीख दी,
ये गुरुजन अरु तात।।
सखा मेरे, बंधु सभी,
लखत नेह उमगात।।
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लख आकुलता पार्थ की,
दुविधा दैन्य अपार।।
देकर गीता ज्ञान हरि,
कियो मोह निस्तार।।
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कर्म निरत अर्जुन हुआ,
पाया हरि सौं ज्ञान।।
गुंजित रण भेरी हुई,
छिड़ा युद्ध अभियान।।
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गीता अमृत घूंट मधुर,,
चखत होय कल्याण।।
हरि मुख निकसे वचन यह,
करें मोह परित्राण।।
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ज्ञान सुकर्म अकर्म का ,
निकाम कर्महि भास।।
साध्य रखो श्रेयस सदा,
तजहु कर्म फल आस।
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दुख सुख हास विषाद में,
रखो सदा सम भाव।।
जाय गहो हरि की शरण,
व्यापे नाहिं अभाव।।
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अज्ञ तमस हर रवि किरण,
चेतनता का भास।।
दर्शन श्री हरि रूप का,
ज्योति विराट उजास।।
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विजय धर्म अरु सत्य की,
अनय अधर्महि नास।।
मुक्ति का सोपान यही,
सकल अमंगल त्रास।
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गीता पुनीत कल्प तरु ,
मनसा पूरी होय।।
होय मनुज जीवन सुफल,
करहि पाठ जो कोय।।
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अजर अजन्म है आत्मा,
सके न कोई मार।।
मृत्यु रूप नव जन्म को ,
यह गीता को सार।।
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वीणा गुप्त
नई दिल्ली




