साहित्य

गीता महिमा

वीणा गुप्त 

कुरु क्षेत्र में देख स्वजन,

आकुल पार्थ अपार।।

गात कंपहि अश्रु स्रवत,

करता आर्त पुकार।।

*********************

केशव कैसे करूँ मैं,

निज प्रिय जन का घात।।

भागी बनूँ अधर्म का,

कहन लगा बिलखात।।

*********************

पाला पोसा सीख दी,

ये गुरुजन अरु तात।।

सखा मेरे, बंधु सभी,

लखत नेह उमगात।।

*********************

लख आकुलता पार्थ की,

दुविधा दैन्य अपार।।

देकर गीता ज्ञान हरि,

कियो मोह निस्तार।।

*********************

कर्म निरत अर्जुन हुआ,

पाया हरि सौं ज्ञान।।

गुंजित रण भेरी हुई,

छिड़ा युद्ध अभियान।।

*********************

गीता अमृत घूंट मधुर,,

चखत होय कल्याण।।

हरि मुख निकसे वचन यह,

करें मोह परित्राण।।

**********************

ज्ञान सुकर्म अकर्म का ,

निकाम कर्महि भास।।

साध्य रखो श्रेयस सदा,

तजहु कर्म फल आस।

**********************

दुख सुख हास विषाद में,

रखो सदा सम भाव।।

जाय गहो हरि की शरण,

व्यापे नाहिं अभाव।।

*********************

अज्ञ तमस हर रवि किरण,

चेतनता का भास।।

दर्शन श्री हरि रूप का,

ज्योति विराट उजास।।

**********************

विजय धर्म अरु सत्य की,

अनय अधर्महि नास।।

मुक्ति का सोपान यही,

सकल अमंगल त्रास।

**********************

गीता पुनीत कल्प तरु ,

मनसा पूरी होय।।

होय मनुज जीवन सुफल,

करहि पाठ जो कोय।।

**********************

अजर अजन्म है आत्मा,

सके न कोई मार।।

मृत्यु रूप नव जन्म को ,

यह गीता को सार।।

*********************

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!