
गुरु बिना न ज्ञान प्रखर है,
गुरु बिना पहचान कहाँ,
गुरु ही साहस, गुरु ही शक्ति,
गुरु बिन ऊँची उड़ान कहाँ।
जिसने गुरु का मान किया,
इतिहास उसी का गान करे,
गुरु चरणों की रज से बढ़कर,
इस धरती पर वरदान कहाँ।
गुरु हैं गंगा, गुरु हैं सागर,
गुरु ही वेदों का विस्तार,
गुरु से उज्ज्वल होता जीवन,
गुरु से मिलता सच्चा सार।
जिस माथे पर गुरु का आशीष,
उसको झुका न पाया काल,
गुरु की वाणी वज्र बने तो,
काँप उठे सारा संसार।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




