साहित्य

गुरु पूर्णिमा : आदिगुरु वेदव्यास वंदना

दिनेश पाल सिंह

*गुरु स्तवन*

*गुरु हैं ज्ञान-दीप अविनाशी*,

*गुरु जीवन का सत्य-विचार।*

*गुरु से ही आलोकित होता,*

*मन-मंदिर का हर द्वार।*

 

*गुरु ही वेदों की वाणी हैं,*

*गुरु ही श्रद्धा का आधार।*

*ऐसे गुरुवर को शत वंदन,*

*बारंबार नमन स्वीकार॥*

 

तम में जिसने दीप जलाए,

ज्ञान-ज्योति घर-घर फैलायी।

वेद-वाणी के अमृत से,

भारत-भूमि पावन बनायी।

 

महाभारत का दिव्य उजाला,

गीता का अमृत बरसाया।

पुराणों के पावन सागर से,

मानव जीवन धन्य बनाया।

 

हे व्यास! तेरे चरण-कमल पर,

श्रद्धा-सुमन चढ़ाने आया।

तेरे पावन ज्ञान-प्रकाश से,

जीवन-पथ उजियाने आया।

 

गुरु केवल उपदेशक कब हैं,

जीवन के आधार बने।

भटके मन को राह दिखाकर,

सत्य-धर्म पतवार बने।

 

कलम जहाँ भी सत्य लिखेगी,

व्यास-स्मृति मुस्काएगी।

भारत की हर ज्ञान-धारा,

तेरी महिमा गाएगी।

 

जब तक गंगा बहे धरा पर,

जब तक सूरज-चाँद रहेंगे।

व्यास-ज्ञान के अमर प्रदीप,

युग-युग तक जलते रहेंगे।

 

आओ आज प्रणाम करें हम,

ज्ञान-दीप के उस उद्गाता को।

शत-शत नमन समर्पित है,

भारत के आदिगुरु व्यास को॥

 

*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*

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