
*गुरु स्तवन*
*गुरु हैं ज्ञान-दीप अविनाशी*,
*गुरु जीवन का सत्य-विचार।*
*गुरु से ही आलोकित होता,*
*मन-मंदिर का हर द्वार।*
*गुरु ही वेदों की वाणी हैं,*
*गुरु ही श्रद्धा का आधार।*
*ऐसे गुरुवर को शत वंदन,*
*बारंबार नमन स्वीकार॥*
तम में जिसने दीप जलाए,
ज्ञान-ज्योति घर-घर फैलायी।
वेद-वाणी के अमृत से,
भारत-भूमि पावन बनायी।
महाभारत का दिव्य उजाला,
गीता का अमृत बरसाया।
पुराणों के पावन सागर से,
मानव जीवन धन्य बनाया।
हे व्यास! तेरे चरण-कमल पर,
श्रद्धा-सुमन चढ़ाने आया।
तेरे पावन ज्ञान-प्रकाश से,
जीवन-पथ उजियाने आया।
गुरु केवल उपदेशक कब हैं,
जीवन के आधार बने।
भटके मन को राह दिखाकर,
सत्य-धर्म पतवार बने।
कलम जहाँ भी सत्य लिखेगी,
व्यास-स्मृति मुस्काएगी।
भारत की हर ज्ञान-धारा,
तेरी महिमा गाएगी।
जब तक गंगा बहे धरा पर,
जब तक सूरज-चाँद रहेंगे।
व्यास-ज्ञान के अमर प्रदीप,
युग-युग तक जलते रहेंगे।
आओ आज प्रणाम करें हम,
ज्ञान-दीप के उस उद्गाता को।
शत-शत नमन समर्पित है,
भारत के आदिगुरु व्यास को॥
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*




