
नीले आसमान में चांदनी
का निखार आया है,
चाँद चुपचाप ज़मीं पर
उतर आया है।
हाथ में गुलाबों की महक
जैसे सदियों का कोई प्यार
जमीं पर उभर आया है।
देखकर रुख़ पे मुक़म्मल
सी उदासी की लकी़र,
वक़्त ख़ुद नयनों की
पलकों पे ठहर आया है।
कौन कहता है कि तन्हाई में
कुछ भी नहीं,
आज हर अक़्स में कोई
अपना नज़र आया है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




