साहित्य

उज्जैन और ओंकारेश्वर यात्रा 

रविशंकर 

 

सन् 2018 , जाड़े का दिन, मेरी सेवा काल में भी यह इच्छा तो प्रबल रहती थी कि पोते के जन्मदिन के अवसर पर तो एन सी आर भिवाड़ी से रायबरेली पहुंच ही जाएं अतएव मैं 26 जनवरी के आसपास रायबरेली आगया। जब, 29 जनवरी को पौत्र कुशाग्र का जन्मदिन होता है,उसी शाम मुझे दिल्ली के लिए निकलना था। मुझे तेज हरारत सी थी अतः मैंने जाने का कार्यक्रम रोक दिया।

अब घर वाले नाराज कि फालतू में घर क्यों बैठना है दवा लीजिए और कुछ ठीक होते ही चलिए कहीं घूमने चलते हैं। बहुत दिनों से उज्जैन, महाकाल के दर्शन की अभिलाषा थी अतः वहीं का कार्यक्रम बनाकर पत्नी, पौत्र और पुत्रवधू के साथ स्कार्पियो से सायं तक हमलोग निकल पड़े।

रायबरेली से तीस किलोमीटर दूर रायबरेली -कानपुर रोड से कटकर फतेहपुर की तरफ मुड़े और गंगा पार कर प्रयाग -कानपुर हाईवे मतलब जी.टी. रोड से कानपुर की तरफ चल दिए। कानपुर क्रास करने के बाद इसी रोड पर चलते -चलते इटावा पार करने के बाद कोटा (राजस्थान) जाने वाले हाईवे के रास्ते चल पड़े। रातभर चलते हुए जब कोटा जब 55-60 किलोमीटर मेरी गाड़ी आठ बजे सुबह के लगभग खराब हो गई।बगल के ढाबा पर सुबह का चाय-नाश्ता हुआ। करीब साढ़े दस बजे गाड़ी ठीक हुआ तो कोटा की तरफ चल पड़े।कोटा के 44-45 किलोमीटर पहले ही हमें बायीं तरफ उज्जैन के लिए मुड़ना था। खैर हम लोगों ने वह वह हाईवे बायें तरफ वाली सड़क से चलते रहे -चलते रहे झालावाड़ को पार करते हुए और उसके बाद रास्ते में कई एक जगह पवन उर्जा के दर्शन करते हुए करीब करीब दो -ढाई बजे के आसपास उज्जैन, महाकाल की नगरी पहुंच गए।

होटल में गाड़ी पार्क कराया।कमरा लिया, मंदिर के नजदीकी क्षेत्र में ही। कुछ विश्राम और फ्रैश होने के बाद चिर प्रतीक्षित अभिलाषा को पूर्ण करने दर्शन हेतु चल पड़े। लम्बी लाइने, कुछ कम पेमेंट कम लंबी लाइन और विशेष पेमेंट की बिना लाइन दर्शन की व्यवस्था थी। ठीक से याद नहीं पर 150 रूपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से भुगतान कर हमलोग अंदर हो लिए पर इसके पहले एक जगह सुनिश्चित कर लिए की वापसी पर यहीं सभी को मिलना है।

अंदर कतारबद्ध श्रृंखला में चौकोर गलियारों से नीचे की तरफ उतरते जाना था। महाकाल के जयघोष के संग श्रद्धानवत अपार भक्त समुदाय। एक मंजिल ऊपर से ही महाकाल का दिव्य दर्शन होने लगा था।

आरती का समय हो चुका था। शिव तांडव स्तोत्र की अद्भुत पावन ध्वनि गुंजायमान थी, समय जैसे ठहर गया हो।

आरती पूर्ण होने के पश्चात निकट से दर्शन। सचमुच पावनता का अलौकिक संगम था।

दर्शन करने के पश्चात साढ़े आठ बजे से दस बजे तक बाहरी परिक्षेत्र में घूमते हुए रात्रि भोजन के बाद हमलोग होटल पहुंच गए। होटल वाले ने बताया कि भस्म आरती देखनी हो तो साढ़े तीन बजे सुबह उठना पड़ेगा, उसने ठीक समय पर आकर बताया भी, पर यात्रा की थकान और नींद से बोझिल पलकों ने सुबह ही उठने का उपक्रम किया और करीब करीब आठ बजे महाकालेश्वर मंदिर के पीछे की तरफ पावन क्षिप्रा नदी के दर्शन करते हुए हम सभी निर्माणाधीन कारीडोर की तरफ चल दिए। वहां सुरम्य तालाब, महाकवि कालिदास और सभी नवरत्न के दर्शन हुए। सिंहासन बत्तीसी और राजा विक्रमादित्य से संबंधित जानकारियों को समेटते हुए उसके बाद काल भैरव के दर्शन के लिए चल दिए।

काल भैरव के दर्शन में एक विशेष बात जो दिखाई दिया कि प्रत्येक श्रद्धालु चढ़ावे में शराब की बोतल अपनी सुविधानुसार क्वार्टर, हाफ या बोतल के रूप में चढ़ा रहा था।

खैर हम लोगों ने अन्य सामग्री चढ़ावे की लिया और दर्शन कर के लौट आए। वहां के पश्चात सांदिपनी मुनि का आश्रम एवं कुछ अन्य जगहों का दर्शन करते हुए होटल आ गये। तीन -चार बजे सायं के आसपास का समय हो चुका था। तत्काल कार्यक्रम बनाकर इंदौर होते हुए ओंकारेश्वर के लिए निकल पड़े। सड़कें मध्यप्रदेश की प्रभावित कर रहीं थी , बनिस्पत अन्य राज्यों की तुलना में। लगभग सात बजे के करीब करीब पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे अमलेश्वर मंदिर वाले छोर पर खंडवा जिले में पहुंच गए।

नर्मदा के किनारे इसी छोर पर गाड़ी पार्किंग की सुविधा थी अतएव पैदल पुल से ओंकारेश्वर के दर्शन हेतु उस पार के लिए चल दिए। पावन नर्मदा की कल-कल, रात्रि का समय जगमग रोशनी में बाबा ओंकारेश्वर का दरबार सजा हुआ था। कुछ पुजारी लोगों के कहने पर संकल्प की प्रक्रिया पूरी की गई। ओंकारेश्वर के दर्शन हुए पर इसी बीच पोते को दीर्घशंका समाधान के लिए पुत्रवधू उसे लेकर उस पार गाड़ी पार्किंग के पास चली गई थी।

थोड़ी परेशानी हुई, लाउडस्पीकर से उद्घोषणा भी कराया गया। पर दूसरे छोर पर सभी मिल गये। पुनः वापस ओंकारेश्वर मंदिर गए इन लोगों ने दर्शन किया फिर इस पार अमलेश्वर के दर्शन के लिए आकर कतारबद्ध हो लिए। यहां आरती भी हो रही थी। ऐसी मान्यता है कि दोनों जगह का दर्शन अत्यावश्यक है।

रात्रि ग्यारह बजे का लगभग समय था, इसके पहले कुछ हल्का डिनर करने के उपरांत हम सभी इंदौर के लिए वापस चल दिए। इंदौर पहुंचने पर यह निश्चित हुआ कि भोपाल चलें और मेरे साढ़ू डा. ओमप्रकाश त्रिपाठी और साली साहिबा सुमति त्रिपाठी से मिलते हुए (जो उन दिनों फ्रेंड्स कॉलोनी भोपाल में रहते थे) आगे के लिए प्रस्थान करेंगे।

बड़ा शहर भोपाल,दो -तीन बार पहले भी जा चुका हूं, आकर्षित करता है। भोपाल बाईपास से गुजरते हुए तीन -चार बजे सुबह का समय हो चुका था।

थोड़ा पहले पहुंचे होते तो विश्राम का समय मिल सकता था। तड़के सुबह सभी को जगाना किसी तरह उचित नहीं लगा। पत्नी की अपनी छोटी बहन से मोबाइल फोन पर बात हुई और हम लोग बाईपास से ही बढ़ते हुए मंडी द्वीप पार कर रायसेन जिले में आगे की तरफ बढ़ते रहे। आश्चर्यजनक घाटी के दर्शन हुए।कार लगातार ढलान पर उतरती जा रही थी, सुबह होने में अभी देर थी। गाड़ी लगता था जैसे पाताल की तरफ जा रही हो।ढलान फिर आगे ढलान के क्रम का अद्भुत दृश्य था, करीब एक घंटे से ऊपर यही चलता रहा।

फिर आगे दिखा खुला मैदान, सामने रोड पर दिखा विदिशा के लिए माईल स्टोन,कितने किलोमीटर यह तो ध्यान नहीं पर राहत की सांस मिली।

कुछ समय बाद बायें तरफ विदिशा दिखता रहा और हम आगे बढ़ते रहे। विदिशा का नाम आते ही यदि आपका हिन्दी साहित्य के प्रति थोड़ा भी लगाव है तो चल-चित्र की तरह बहुत सारी बातें कौंध जाती है। हिंदी साहित्य के कई महत्वपूर्ण शख्सियत विभिन्न कालक्रम में अपना -अपना समय यहां व्यतीत किए हैं और साहित्य को समृद्ध किया है। मुक्तिबोध और शलभ श्रीराम सिंह ने अपने -अपने कालखंड यहां व्यतीत किए थे।

विजय बहादुर सिंह जी ने अपने सृजन की लम्बी अवधि यहीं विताया है, विदिशा उनकी कर्मस्थली रही है।

विदिशा एक धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक नगरी है।

ऐतिहासिक सांची का स्तूप भी इससे कुछ ही दूरी पर अवस्थित है।

विदिशा पार करने के समय ही उजियारा हो चुका था। लगभग साढ़े छः बजे का समय रहा होगा।अगला शहर सागर था। मेरी कार सरपट भागती जा रही थी, करीब करीब घंटे भर बाद दायीं तरफ एक विशाल पहाड़ी के दर्शन हुए, उससे कुछ हटकर क्षितिज के उपर भुवन भास्कर का भुवन मोहिनी दर्शन,अति सुंदर प्राकृतिक छटा, अद्भुत, अनुपम सौन्दर्य, सवेरा हो तो ऐसा हो। चलते रहे, चलते रहे तीस-चालीस मिनट तक यह दृश्यावलोकन बना रहा। दो-ढाई घंटे के लगभग समय सागर पहुंचने में लगा।

सागर की अन्य विशिष्टताओं के अतिरिक्त डा. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय के कारण भी अति प्रसिद्धि है।

प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक विरासत को समेटे हुए यह नगर एक बड़ी झील के पास बसा हुआ है।

एक लंबी दूरी सागर से आगे चलते हुए लगभग अस्सी किलोमीटर ठीक से याद नहीं, एक बड़े चौराहा से हम लोग छतरपुर की तरफ मुड़ लिए। दोपहर के बाद वनों को पार करते हुए छतरपुर में प्रवेश किए। सोचा कि यहां का महल देख लिया जाए, पर उस समय वह दर्शकों के लिए खुला हुआ नहीं था और हमें अपनी मंजिल की ओर पहुंचने की जल्दी थी। अतः छतरपुर पार करके कानपुर रोड पर, कानपुर की तरफ बढ़ चले।

चलते रहे, चलते रहे, कानपुर करीब 125 किलोमीटर दूर रह गया होगा।(पहले यह सोचा गया था कि कानपुर से रायबरेली आ जायेंगे।

पर अचानक दायीं तरफ देखा तो एक लिंक रोड दिखी और माईल स्टोन पर लिखा मिला बांदा -बीस किलोमीटर।

तुरंत रास्ते का परिवर्तन करके बांदा पहुंच गए और बांदा का प्रसिद्ध सोहन हलवा खरीदते हुए, थोड़ा विश्राम कर, बांदा से आगे सर्वप्रथम यमुना पार किया। फिर फतेहपुर के आगे गंगा पार कर के लालगंज होते हुए रायबरेली नौ बजे रात्रि में पहुंच गए।

 

रविशंकर

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