साहित्य

सच्चे संस्कार 

सुमन बिष्ट

चंद लोग कहते हैं,

“परंपरा की चौखट से बाहर मत जाना,

यही मर्यादा है, यही धर्म निभाना।”

मैंने देखा,

मर्यादा के नाम पर कितनी आवाज़ें दबी थीं,

कितनी इच्छाएँ बिना जन्मे ही मरी थीं।

 

मैंने अपने आप से पूछा,

क्या संस्कार वही हैं

जो आत्मा को पिंजरे में बंद कर दें?

क्या आदर्श वही हैं

जो सपनों के पंख काटकर शांत कर दें?

 

नहीं, बिल्कुल नहीं,

संस्कार तो वह दीप हैं

जो भीतर का अंधेरा हरते हैं,

जो मनुष्य को मनुष्य बनाकर

दूसरों के दुःख को समझना सिखाते हैं।

 

मैं उस युग की बेटी हूँ

जहाँ प्रश्न करना अपराध नहीं,

और मौन रहना महानता नहीं।

मैंने सीखा है,

सम्मान माँगा नहीं जाता,

स्वयं के भीतर जगाया जाता है।

 

मैं बच्चों को झुकना नहीं,

सत्य के साथ खड़ा होना सिखाऊँगी।

बेटी को यह नहीं कहूँगी

कि सह लेना ही स्त्रीत्व है,

और बेटे को यह नहीं पढ़ाऊँगी

कि अधिकार ही पुरुषत्व है।

 

मैं उन्हें बताऊँगी कि,

मनुष्य का सबसे सुंदर आभूषण

उसकी करुणा होती है,

और सबसे बड़ा धर्म

जब किसी की आत्मा को चोट नहीं पहुँचती है।

 

मैं घर की दीवारों तक सीमित नहीं,

विचारों की धरती सींच रही हूँ।

मैं नई पीढ़ी के मन में

स्वतंत्रता के बीज बो रही हूँ।

 

हाँ,

मैं वही आज की पीढ़ी हूँ

जो परंपराओं से युद्ध नहीं करती,

बस उन्हें नया अर्थ देती है।

जो रिश्ते निभाती भी है

और स्वयं को खोती भी नहीं है।

 

क्योंकि

ये समाज तब नहीं बदलता

जब औरतें चुप रहना सीख जाएँ,

समाज तब बदलता है

जब बच्चे बराबरी में जीना सीख जाएँ।

 

और शायद ,

सच्चे संस्कार वही हैं

जहाँ किसी की उड़ान देखकर

घर की इज़्ज़त कम नहीं होती है

बल्कि आकाश थोड़ा और ऊँचा हो जाता है।

 

स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति

सुमन बिष्ट, नोएडा

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