की पहली किरण संग जब तन को मोड़ा,
साँसों की डोर से जब मन को जोड़ा,
तब जाना योग नहीं बस आसन है,
ये तो जीने का सबसे सरल व्यासन है ।
ऋषियों की थाती, भारत की पहचान है,
तन-मन की पीड़ा की यही समाधान है,
अनुलोम-विलोम से शुद्ध हुई जब काया,
भस्त्रिका ने मन का सारा मैल धोया।
पद्मासन में बैठा तो मौन मिला,
शीर्षासन ने नया दृष्टिकोण दिया,
ईश्वर भक्ति से ऊर्जा जागी,
शवासन में थकान सारी भागी।
धर्म नहीं ये, विज्ञान की भाषा है,
हर साँस में छुपी सेहत की परिभाषा है ,
इक्कीस जून को दुनिया झुकती है,
योग से ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ उगती है।
मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन




