
“नदी किनारे बसी थी दुनिया,
बाल-गोपाल ने रची थी दुनिया।
निकल झोपड़ी से आए सब मिलकर,
इक आम्र वृक्ष लहराए तटपर,
लटक रहें थे आम उसी पर,
बच्चों के तो मन ललचाए,
पर उनमें थी समझ भी भारी,
अभी पकने में कुछ समय लगेगा,
जल क्रीड़ा में संतोष था काफ़ी,
अवकाश के दिन भी हैं बाक़ी।
बात ज्ञान की करते हैं कुछ दिन,
मौसम भी है बड़ा सुहाना,
न बारिश,न आँधी-पानी,
चलो खेलें मिल दोहा-अंत्याक्षरी।
अपना सुंदर समय बिताएँ,
जबतक दुपहरी का भोजन बन जाए।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर,।। उत्तराखंड




