साहित्य

मानसून

ममता झा मेधा 

पती धरती, सूखे होंठ,

आस का दीप बुझा-बुझा सा।

फिर पुरवा ने भेजी पाती,

घिर आए बदरा कजरारे सा।।

 

बिजली चमकी, बादल गरजे,

मोर ने पंख पसार दिए।

मिट्टी की सोंधी खुशबू ने,

सबके मन त्यौहार किए।।

 

पहली बूँद गिरी आँगन में,

बच्चे नाचे, कागज़ की नाव।

छत पर दौड़ी चूड़ियों की खनक,

भीगा चूल्हे का ताव।।

 

किसान की आँखों में चमक,

हलधर ने बैलों को पुचकारा।

धरती ने ओढ़ी हरी चुनरिया,

हर खेत लगा न्यारा-न्यारा।।

 

प्रेमियों का सावन आया,

कजरी गीतों की सरगम।

झूले पड़े नीम की डाली,

पींग बढ़ाए हर इक मौसम।।

 

मानसून तू केवल ऋतु नहीं,

तू है उम्मीद की भाषा।

तपती रूह को मिल जाए,

तेरी हर बूँद से आशा।।

 

सूखे मन पर भी बरस जाना,

यही तो मानसून का धर्म है।

जो रूठे हैं उनको मनाना,

यही प्रेम का मर्म है।

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ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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