
आग की लपटों को देखकर,
हो गए सब लोग हैरान।
खिड़कियों से बाहर कूद कर,
बच्चे बचा रहे थे जान।
चीखें गूंजती रही परिसर में,
परिजनों का हो रहा था हाल बेहाल।
सपने जले अरमान बिखरे,
कितनी जिंदगियां ले गया काल?
मासूम बच्चों ने दुनिया देखी नहीं,
और जिंदगी बन गई अफसाना।
क्या-क्या ख्वाब सजाए होंगे दिल में?
बनकर रह गए एक फसाना।
सुरक्षा सजगता और जिम्मेदारी,
कोचिंग वाले उठाते क्यों नहीं?
एक हादसे के बाद दूसरा हादसा,
ये अपना कर्तव्य निभाते क्यों नहीं?
मुआवजे से क्या चैन वापस आएगा?
कितने घरों के चिराग बुझ गए।
सरकार खानापूर्ति करती रह जाएगी,
कितने बच्चे अपनों से बिछड़ गए।
लखनऊ अग्नि कांड को कोई,
शायद ही कभी भूल पाएगा।
जब यह तारीख वापस आएगी,
मासूम बच्चों का चेहरा याद आएगा।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




