
कैंसर है मुझको, आज दवाई खाने दीजिए,
सोया नहीं रातों से, आज सो जाने दीजिए।
साँसें उधार सी लगती हैं इस टूटे जिस्म में,
दो पल का ही सही, थोड़ा सुकून लीजिए।
मैं पिता हूँ, दर्द दिखाना मुझे आता नहीं,
आँसू छुपा के, हँसी का कर्ज़ निभाता हूँ।
मेरे हिस्से की थकान, आज तुम लीजिए,
कल के लिए मैं फिर ,खुद को बचा लाता हूँ।
बच्चों के सपनों की खातिर,जिया हूँ उम्र भर,
अब मेरे दर्द का बोझ, कुछ हल्का कीजिए।
आवाज़ अगर मेरी, काँप रही है तो आज,
कमज़ोरी नहीं इसे, मजबूरी समझ लीजिए।
गर कल न रहूँ तो, शिकवा कभी मत करना,
मेरी हर साँस में तुम ही बसे थे मान लीजिए।
‘दिव्य’ दर्द भरी दास्तां,पिता की चुप पुकार,
आख़िरी बार मुझे भी,अपना समझ लीजिए।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




