
ग़ज़ल: थोड़ा तो ठहर जाते
मतला
ज़माने को सुनाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते,
मुझे यूँ आज़माने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
शेर २
लगाए तीर जो तुमने, कलेजा छलनी-छलनी है,
वो तीर-ए-ग़म चलाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
शेर ३
अदालत थी परायों की, मुहाफ़िज़ (रक्षक) तुम हमारे थे,
मगर यूँ सर झुकाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
शेर ४
बहुत मसरूफ़(व्यस्त) थे तुम भी, मगर ऐ महफ़िल-ए-दुनिया,
तमाशा ये बनाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
शेर ५
गिला तुमसे नहीं कोई, गिला तो अपनी क़िस्मत से,
कदम आगे बढ़ाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
शेर ६
हमारे दरमियाँ जो था, वो इक पाकीज़ा रिशता था,
उसे मिट्टी में मिलाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
मक़्ता
जो बिखरे हैं मेरे आँसू, तुम्हारी आँख नम होगी,
यूँ ‘सुमन’को रुलाने से पहले थोड़ा तो ठहर जाते।
पूर्णिमा सुमन




