
ज़िन्दगी है रंगों का खजाना,
न कहीं जाना न कहीं आना।
उलट-पुलट कर जब चाहो,
खोलते रहो ज़िन्दगी की किताब,
अरे-अरे खोलने की भी ज़रूरत नहीं,
वक्त की हवा में खुद बखुद फड़फड़ाते हैं इसके सारे पन्ने,
दिखा जाते रंग-बिरंगे, स्याह-सफ़ेद बख़ूबी सारे पन्ने सही।
स्मृतियों का झोंका समय के झूले पर,
लेता रहता है झकोरा, कभी तीव्र,कभी मंद कभी मंथर।
बचपन से बुढ़ापे की सीढ़ी पर,
अर्थी का होता है आखिर क्यों डर,
चोला पहना है तो इक दिन बदलना ही होगा,
यही तो है जीवंत सच्चाई का रंग!
इस रंग रोगन से तो प्रभु भी न छूटे, फिर हम तो हैं एक अदने से उसी के अंग।।
रचनाकार –
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक मन के भाव,©®, रूद्रपुर ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



