
हृदय कुंज का समतल कोना,
वहाँ बिछा है , एक बिछौना ।
जब तक मैं फुर्सत ना पाऊं,
तब तक तुम हरगिज ना सोना ।
हृदय कुंज में साँझ घिरी है,
अरमानों के उच्च शिखर हैं ।
निशा आगमन, सांझ विदाई,
मधुर स्वप्न भी हुए मुखर हैं ।
किंचित श्वेत कहीं हैं श्यामल,
प्रश्नों के मँडराते घन हैं ।
अंतस में छिपे प्रेम प्रणय के,
इंदधनुष सम रंग सघन हैं ।
लगी सुहावन निशा, प्रीत की,
काली किन्तु घोर उजियारी ।
प्रश्नों की सब गुंथी सुलझी ,
थिरकी जब मुस्कान तुम्हारी ।
सरोज शर्मा
दिल्ली



