साहित्य

हरगिज मत सोना 

सरोज शर्मा

हृदय कुंज का समतल कोना,

वहाँ  बिछा  है , एक  बिछौना ।

जब तक  मैं  फुर्सत  ना  पाऊं,

तब तक तुम हरगिज ना सोना ।

 

हृदय  कुंज  में  साँझ  घिरी है,

अरमानों  के  उच्च  शिखर  हैं ।

निशा आगमन, सांझ  विदाई,

मधुर स्वप्न  भी  हुए  मुखर  हैं ।

 

किंचित श्वेत कहीं हैं श्यामल,

प्रश्नों    के   मँडराते   घन    हैं ।

अंतस में छिपे  प्रेम  प्रणय के,

इंदधनुष   सम  रंग  सघन  हैं ।

 

लगी सुहावन निशा,  प्रीत की,

काली  किन्तु  घोर  उजियारी ।

प्रश्नों  की  सब   गुंथी  सुलझी ,

थिरकी जब  मुस्कान  तुम्हारी ।

 

सरोज शर्मा

दिल्ली

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