
गुफ्तगू करतीं हैं कलियाँ भी हवा के सामने।
महकने लगती फिजाँ गूँजे सदा के सामने।
थी बहुत खामोश आंखेँ फिर भी कहना तो था कुछ,
पर हठीले अश्क थे उतरे अदा से सामने।
थे बड़े मुश्किल के पल शामे अलम का डर भी था,
आ गया बन राहबर कोई क़जा के सामने।
किस तरह आंखेँ बरसती रही एक दीदार को,
मिल गई उनको शिफ़ा मेरी दुआ के सामने।
सब खयालोँ ख्वाब की बातें फ़कत धोखा रहीं,
वो मुहब्बत थे फरेबी बस वफा के सामने।
संगीता श्रीवास्तव शिवपुरी




