
काश वो लम्हें लौट के आयें
और जिंदगी फिर से मुस्कुराए,
जो पल हँसी में यूँ ही ढल जाते थे,
काश वो लम्हें लौट के आयें |
वो बारिश में भीगती हुई राहें,
वो चाय की प्याली,
वो अनगिनत सी चाहें,
वो अपनों का बेफ़िक्र साथ,
हर मोड़ पर मिलता विश्वास,
काश वो लम्हें लौट के आयें |
यादों की इक धूल जमी है,
हर तस्वीर में एक कमी है।
रफ्तार समय की सब ले गई,
हँसी भी अब ख़ामोश-सी रह गई,
काश,वही शाम फिर से उतर आए,
बीते कल का सूरज फिर से मुस्काए,
अधूरे ख़्वाब फिर से सँवर जाएँ,
टूटे रिश्ते फिर से जुड़ जाएँ,
मालूम है… कि,
वक्त कभी भी लौटता नहीं है,
बीता हुआ कल फिर से संवरता नहीं है,
फिर भी दिल हर दुआ में यही कहता है-कि,
काश वो लम्हें लौट के आयें,
और जिंदगी फिर से मुस्कुराए ||
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब
स्वरचित मौलिक रचना
29-06-2026




