
पथरीली राहें थक गए पग, छाले उभरे तो क्या हुआ?
हर ड़गर की है यही गाथा, मोड़ बिन पथ क्या हुआ?
इन विकट राहों में ही छुपा, यात्रा का असली रोमांच है,
कर लो विश्राम जो थक गए, फ़िर भरो दम नव आज है।
दूने विहँस उत्साह से, अब क़दम आगे तुम बढ़ाओ,
लक्ष्य से ओझल न दृष्टि हो, बस निरंतर चलते जाओ।
हिम्मत जो हारी मुड़े पीछे, खो दोगे पहचान तुम अपनी,
सुख-चैन खोना व्यर्थ है,
मत बुझाओ अंतर-अग्नि।
हारना ख़ुद से मत कभी, जीते जी यह मरना यहाँ,
है श्रेष्ठ संघर्ष सदा पलायन से, सत्य कहता यह जहाँ।
जूझते पथ पर ही फूटेगी, दिव्य पावन भोर की किरण,
बढ़ता चल आगे राही तू,
चूम लेगी मंजिल चरण।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




